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रुपये में गिरावट के लिए इमेज परिणाम

फरीद अब्बासी 

अभी पिछले साल तक वैश्विक अर्थव्यवस्था का इंजन माने जाने वाली इंडियन इकोनॉमी आज हांफ रही है। एक तरफ जहां रुपया अपनी ऐतिहासिक गिरावट की ओर बढ़ रहा है वहीं तेल के दामों में आया हुआ उछाल सरकार के लिए सिर दर्द साबित हो रहा है। वैश्विक कारणों को नजरंदाज भी कर दिया जाये तो इस बुरी स्थिति के लिए सरकार की प्रयोगवादी अर्थ नीति भी कम जिम्मेदार नहीं है।

भारतीय मुद्रा रुपया इस समय लगातार गिरावट की मार झेल रहा है। कहा जाता है कि किसी देश की करेंसी के साथ उस देश की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई होती है और जैसे-जैसे करेंसी गिरती है, तैसे-तैसे देश की प्रतिष्ठा गिरती है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए यूपीए सरकार के दौर में जब रुपये का अवमूल्यन होता था तो बड़ा हंगामा खड़ा हो जाता था। आज देखिए, रुपये की कीमत जिस तेजी से गिर रही है। उसको लेकर सरकार के स्तर पर एक बेफिक्री आ आलम दिखाई पड़ता है। जबकि सरकार अर्थव्यवस्था के सभी मोर्चों पर फेल होती दिखाई पड़ रही है। देश जब आजाद हुआ तब एक रुपया एक डॉलर के बराबर था। जब अटल जी ने पहली बार सरकार बनाई, तब तक मामला पहुंच गया था 42 रुपये तक, जब अटल जी ने छोड़ा तो 44 रुपये पर पहुंच गया था, लेकिन इस सरकार में और अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के कालखंड में ये 60 रुपये पर पहुंच गया है। नरेंद्र मोदी का ये भाषण पांच साल पुराना था जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे, लेकिन उसके बाद से हिंदुस्तान की सियासत में काफी कुछ बदल चुका है, आर्थिक हालात में भी बहुत उठापटक हुई है, लेकिन कभी गिरते रुपये पर मनमोहन सरकार को घेरने वाले ये नेता इन दिनों रुपये में गिरावट को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं। जब मोदी सरकार मई 2014 में दिल्ली में सत्तारूढ़ हुई थी तब डॉलर के मुकाबले रुपया 60 के स्तर के आसपास था, लेकिन इसके बाद से कमोबेश दबाव में ही है। पिछले कुछ महीनों से ये दबाव और बढ़ा है और हाल ये है कि लुढ़कते हुए 15 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है। पिछले एक महीने में डॉलर के मुकाबले इसमें 2 रुपये 29 पैसे की गिरावट आई है।

बीते दिनों रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर 69.09 तक लुढ़क गया। पहली बार डॉलर का भाव 69 रुपये से अधिक हुआ है। वैसे, रुपये ने इससे पहले, अपना सबसे निचला स्तर भी मोदी सरकार के कार्यकाल में ही देखा है। नवंबर 2016 में रुपये ने डॉलर के मुकाबले 68.80 का निचला स्तर छुआ था। हालांकि डॉलर सिर्फ रुपये पर ही भारी हो ऐसा नहीं है। इस साल मलेशियाई रिंगिट, थाई भाट समेत एशिया के कई देशों की करेंसी भी कमजोर हुई है। एक जमाना था जब अपना रुपया डॉलर को जबरदस्त टक्कर दिया करता था। जब भारत 1947 में आजाद हुआ तो डॉलर और रुपये का दम बराबर का था। मतलब एक डॉलर बराबर एक रुपया। तब देश पर कोई कर्ज भी नहीं था। फिर जब 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपये की साख भी लगातार कम होने लगी। 1975 तक आते-आते तो एक डॉलर की कीमत 8 रुपये हो गई और 1985 में डॉलर का भाव हो गया 12 रुपये. 1991 में नरसिम्हा राव के शासनकाल में भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया भी धड़ाम गिरने लगा और अगले 10 साल में ही इसने 47-48 के भाव दिखा दिए। रुपये और डॉलर के खेल को कुछ इस तरह समझा जा सकता है। मसलन अगर हम अमरीका के साथ कुछ कारोबार कर रहे हैं। अमरीका के पास 67,000 रुपए हैं और हमारे पास 1000 डॉलर। डॉलर का भाव 67 रुपये है तो दोनों के पास फिलहाल बराबर रकम है। अब अगर हमें अमरीका से भारत में कोई ऐसी चीज मंगानी है, जिसका भाव हमारी करेंसी के हिसाब से 6,700 रुपये है तो हमें इसके लिए 100 डॉलर चुकाने होंगे। अब हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में बचे 900 डॉलर और अमरीका के पास हो गए 73,700 रुपये। इस हिसाब से अमेरिका के विदेशी मुद्रा भंडार में भारत के जो 67,000 रुपये थे, वो तो हैं ही, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में जो 100 डॉलर थे वो भी उसके पास पहुंच गए। इस मामले में भारत की स्थिति तभी ठीक हो सकती है अगर भारत अमरीका को 100 डॉलर का सामान बेचे….जो अभी नहीं हो रहा है।

यानी हम इंपोर्ट ज्यादा करते हैं और एक्सपोर्ट बहुत कम। करेंसी एक्सपर्ट एस सुब्रमण्यम बताते हैं कि इस तरह की स्थितियों में भारतीय रिजर्व बैंक अपने भंडार और विदेश से डॉलर खरीदकर बाजार में इसकी पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करता है। करेंसी एक्सपर्ट एस सुब्रमण्यम का कहना है कि रुपये की कीमत पूरी तरह इसकी डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का भी इस पर असर पड़ता है। हर देश के पास उस विदेशी मुद्रा का भंडार होता है, जिसमें वो लेन-देन करता है। विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढऩे से ही उस देश की मुद्रा की चाल तय होती है। अमरीकी डॉलर को वैश्चिक करेंसी का रूतबा हासिल है और ज्यादातर देश इंपोर्ट का बिल डॉलर में ही चुकाते हैं। डॉलर के सामने अभी के माहौल में रुपये की नहीं टिक पाने की वजहें समय के हिसाब से बदलती रहती हैं। कभी ये आर्थिक हालात का शिकार बनता है तो कभी सियासी हालात का और कभी दोनों का ही। दिल्ली स्थित एक ब्रोकरेज फर्म में रिसर्च हेड आसिफ इकबाल का मानना है कि मौजूदा हालात में रुपये के कमजोर होने की कई वजहें हैं। रुपये के लगातार कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल के बढ़ते दाम हैं। भारत कच्चे तेल के बड़े इंपोर्टर्स में एक है। कच्चे तेल के दाम साढ़े तीन साल के उच्चतम स्तर पर हैं और 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गए हैं। भारत ज्यादा तेल इंपोर्ट करता है और इसका बिल भी उसे डॉलर में चुकाना पड़ता है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली-विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजारों में जमकर बिकवाली की है। इस साल अब तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 46 हजार 197 करोड़ रुपये से अधिक की बिकवाली की है। अब अमरीकी निवेशक भारत से अपना निवेश निकालकर अपने देश ले जा रहे हैं और वहां बॉन्ड्स में निवेश कर रहे हैं। सवाल ये है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया इसी तरह गिरता रहा तो हमारी सेहत पर क्या असर होगा।

रुपये के लगातार कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल के बढ़ते दाम हैं। भारत कच्चे तेल के बड़े इंपोर्टर्स में एक है। कच्चे तेल के दाम साढ़े तीन साल के उच्चतम स्तर पर हैं और 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गए हैं। भारत ज्यादा तेल इंपोर्ट करता है और इसका बिल भी उसे डॉलर में चुकाना पड़ता है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली-विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजारों में जमकर बिकवाली की है। इस साल अब तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 46 हजार 197 करोड़ रुपये से अधिक की बिकवाली की है। अब अमरीकी निवेशक भारत से अपना निवेश निकालकर अपने देश ले जा रहे हैं और वहां बॉन्ड्स में निवेश कर रहे हैं।

करेंसी एक्सपर्ट सुब्रमण्यम के मुताबिक सबसे बड़ा असर तो ये होगा कि महंगाई बढ़ सकती है। कच्चे तेल का इंपोर्ट होगा महंगा तो महंगाई भी बढ़ेगी। ढुलाई महंगी होगी तो सब्जियां और खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी। इसके अलावा डॉलर में होने वाला भुगतान भी भारी पड़ेगा। इसके अलावा विदेश घूमना महंगा होगा और विदेशों में बच्चों की पढ़ाई भी महंगी होगी। तो क्या रुपये की कमजोरी से भारत में किसी को फायदा भी होता है? सुब्रमण्यम इसके जवाब में कहते हैं कि जी बिल्कुल। ये तो सीधा सा नियम है, जहां कुछ नुकसान है तो फायदा भी है। एक्सपोर्टर्स की बल्ले-बल्ले हो जाएगी। उन्हें पेमेंट मिलेगी डॉलर में और फिर वो इसे रुपये में भुनाकर फायदा उठाएंग। इसके अलावा जो आईटी और फार्मा कंपनियां अपना माल विदेशों में बेचती हैं उन्हें फायदा मिलेगा। माकपा ने देश की अर्थव्यवस्था को बदहाल बताते हुए केंद्र की मोदी सरकार पर सिर्फ प्रचार और वीडियो जारी करने का तमाशा करने का आरोप लगाया है। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने विभिन्न आर्थिक मोर्चों पर सरकार के निराशाजनक प्रदर्शन का हवाला देते हुए कहा कि अर्थव्यवस्था डूब रही है और हर मामले में गरीब भारतीयों की सामान्य गुजर-बसर मुश्किल हुई है। उन्होंने मोदी सरकार के कार्यकाल में निर्यात की गिरावट और वित्तीय वर्ष 2012-13 के बाद वित्तीय घाटा अब तक सर्वाधिक होने संबंधी मीडिया रिपोर्टों के हवाले से सरकार पर अर्थव्यवस्था को गर्त में पहुंचाने का आरोप लगाया। येचुरी ने ट्वीट कर कहा कि सरकार के पास वीडियो जारी करने और प्रचार का तमाशा करने का समय है। अर्थव्यवस्था डूब रही है जिससे गरीब भारतीयों की गुजर बसर बुरी तरह प्रभावित हुई है। मोदी सरकार के चार साल में अच्छे दिनों की यह एक और तस्वीर है।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और रुपये की कीमत में लगातार गिरावट पर भी येचुरी ने चिंता जाहिर करते हुए इसके लिये मोदी सरकार की गलत आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि विदेशी निवेशकों के भारत से वापस जाने से 48 हजार करोड़ रुपये के निवेश में गिरावट के कारण प्रत्यक्ष विदेश निवेश का स्तर पिछले पांच में सबसे कम रहा। इससे जुड़ी मीडिया रिपोर्टों के हवाले से उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा कि रुपये की कीमत गिर रही है, स्विस बैंकों में भारतीय पूंजी बढ़ रही है, जनता संकट में है। यह सरकार द्वारा जनित आपदा है। मोदी सरकार की ‘जुमलानोमिक्स’ में अधिक से अधिक वीडियो जारी करना ही समस्या का एकमात्र समाधान है। कांग्रेस ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की वृद्धि दर पिछले पांच वर्षों में सबसे कम रहने को लेकर सरकार पर निशाना साधा और सवाल किया कि बुनियादी ढांचे का विकास और प्रगति सुनिश्चित करने तथा मंहगाई पर अंकुश लगाने के लिए धन कहां से आएगा। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने केंद्रीय मंत्रियों अरुण जेटली और पीयूष गोयल का परोक्ष रूप से उल्लेख करते हुए ट्वीट किया, ‘प्रिय वित्त मंत्रियों (?), भारत में एफडीआई पिछले पांच वर्षों में सबसे कम है। जनवरी, 2018 के बाद से विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) की निकासी 48,000 करोड़ रुपये रही।’

रूपये में गिरावट के लिए इमेज परिणाम

उन्होंने कहा, ‘2018-19 में व्यापार घाटा बढक़र जीडीपी का 6.4 फीसदी यानी 178 अरब डॉलर हो हो सकता है।’ कांग्रेस नेता ने कहा, ‘बुनियादी ढांचे के विकास, प्रगति सुनिश्चित करने, भुगतानों के संतुलन को बनाए रखने और महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए धन कहां है।’ देश में एफडीआई की वृद्धि दर पांच साल के निचले स्तर पर आ गई है। वर्ष 2017-18 में एफडीआई प्रवाह तीन प्रतिशत की दर से बढ़कर 44.85 अरब डॉलर रहा है। औद्योगिक नीति एवं संवद्र्धन विभाग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार 2017-18 में एफडीआई प्रवाह मात्र तीन प्रतिशत बढ़कर अरब डॉलर रहा है। विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय पूंजी बाजारों से धन की निकासी का क्रम जारी है। इस साल की पहली छमाही में पूंजी बाजारों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की निकासी करीब 48,000 करोड़ रुपये पर पहुंच गई है। यह पिछले 10 साल का उच्च स्तर है। डिपॉजिटरीज के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार जनवरी से जून की अवधि के बीच एफपीआई ने ऋण बाजार से 41,433 करोड़ रुपये और शेयर बाजार से 6,430 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की है। इस प्रकार कुल निकासी 47,836 करोड़ रुपये रही। यह जनवरी-जून 2008 के बाद अब तक की सबसे बड़ी निकासी है। उस दौरान ऋण और शेयर बाजार से कुल 24,758 करोड़ रुपये की निकासी की गई थी। हालांकि वर्तमान निकासी पूरे 2008 में हुई 41,216 करोड़ रुपये की निकासी से बहुत अधिक है। गौरतलब है कि 2008 में दुनिया में आर्थिक संकट छाया था।

…और निचले स्तर पर आ गई एफडीआई

देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की वृद्धि दर पांच साल के निचले स्तर पर आ गई है। वर्ष 2017-18 में एफडीआई प्रवाह तीन प्रतिशत की दर से बढ़कर 44.85 अरब डॉलर रहा है। औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 में एफडीआई प्रवाह मात्र तीन प्रतिशत बढ़कर 44.85 अरब डॉलर रहा है। जबकि, 2016-17 में यह वृद्धि दर 8.67 प्रतिशत, 2015-16 में 29 प्रतिशत, 2014-15 में 27 प्रतिशत और 2013-14 में 8 प्रतिशत रही थी। हालांकि, 2012-13 में एफडीआई प्रवाह में 38 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञों के अनुसार, घरेलू निवेश को पुनर्जीवित करना और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए देश में कारोबार सुगमता को आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण है। डेलाइट इंडिया में भागीदार अनिल तलरेजा ने कहा कि उपभोक्ता और खुदरा क्षेत्र में एफडीआई निवेश की वृद्धि दर कमजोर रहने की मुख्य वजह एफडीआई नीति की जटिलता और अनिश्चितता है। वे कहते हैं, ‘हालांकि सरकार ने नियमों में राहत देने और अस्पष्टता को दूर करने के लिए पर्याप्त प्रयास किए हैं, फिर भी वैश्विक उपभोक्ता और खुदरा कंपनियां भारत में निवेश करने का फैसले लेने में हिचकिचा रही हैं। व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मेलन की रपट से भी यह बात जाहिर होती है कि 2017 में भारत में एफडीआई घटकर 40 अरब डॉलर रहा है जो 2016 में 44 अरब डॉलर था। जबकि, विदेशी निवेश की निकासी दोगुने से ज्यादा बढ़कर 11 अरब डॉलर रहा है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विश्वजीत धर कहते हैं, ‘अर्थव्यवस्था की स्थिति किसी देश में एफडीआई के विस्तार को दर्शाती है। पिछले कुछ सालों में, हम घरेलू निवेश दर में गिरावट देख चुके हैं और अब एफडीआई के हालात भी उसी राह पर हैं।’ उन्होंने कहा कि सरकार को विदेश निवेशकों को आकर्षित करने के लिए घरेलू निवेश को पुनर्जीवित करने के लिए कदम उठाने की जरूरत है। एफडीआई महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि भारत को आने वाले सालों में अपने बुनियादी ढांचे के जीर्णोद्धार को गति देने के लिए बड़े निवेश की जरूरत होगी। विदेशी निवेश में कमी देश के भुगतान शेष पर दबाव डाल सकती है और रुपये की कीमत को भी प्रभावित कर सकती है।

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