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कांग्रेस आलाकमान द्वारा प्रदेश में पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी को साधने की एक नाकाम कोशिश की गई है। नाकाम कोशिश इसलिए क्योंकि इस फैसले ने पार्टी के अंदर एक विचार को जन्म दिया है कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के खेमे ने सिंधिया गुट के ऊपर एक बड़ी जीत हासिल की है। चुनावों से छह महीने पहले इसे एक राजनीतिक दल के लिहाज से शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। यहां कांग्रेस को परास्त तो शिवराज सिंह चौहान को करना था, लेकिन परास्त ज्योतिरादित्य सिंधिया हो गए।

डॉ. एस.पी. सिंह
मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर ज्योतिरादित्य सिंधिया की बजाय कमलनाथ का नियुक्त होना चौंका देने वाली बात है। उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस आलाकमान द्वारा सिंधिया को ही प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी। सिंधिया युवा हैं, उनकी भाषा-शैली भी अच्छी है। वे उम्र से भी युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन, प्रदेशाध्यक्ष का चयन करते वक्त कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी समस्या ये थी कि सिंधिया खेमा और दिग्विजय खेमा प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस के दो अलग-अलग ध्रुव हैं। उनमें आपस में तालमेल नहीं है। यहां कमलनाथ को आगे लाकर कांग्रेस ने एक थ्री वे पैटर्न तैयार करने की कोशिश की है। एक ओर कमलनाथ और सिंधिया साथ-साथ हैं, तो दूसरी ओर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह साथ-साथ हैं। इस तरह से कांग्रेस की चुनावी बिसात बिछाई जा रही है। वहीं, लोग इस पर तो चर्चा ही नहीं कर रहे कि चार कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाए गए हैं, जो कमलनाथ सिंधिया और दिग्विजय के खास हैं और उसमें कोई अनुसूचित जाति से है तो कोई अनुसूचित जनजाति से है, तो कोई पिछड़े वर्ग से है। इस आधार पर एक तालमेल बनाने की कोशिश की गई है। यह जातीय और क्षेत्रीय संतुलन बैठाने की ही एक नाकाम कोशिश का हिस्सा है। बाला बच्चान कमलनाथ के खेमे के हैं, रामनिवास रावत सिंधिया गुट के हैं, तो जीतू पटवारी एक उभरते हुए युवा नेता है जिनका पहले दिग्विजय सिंह से संबंध माना जाता था। इसी तरह अनुसूचित जनजाति के नेता के तौर पर पहचान रखने वाले सुरेंद्र चौधरी को भी कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। यह क्षेत्रीय आधार पर एक समन्वय बनाने की कोशिश है, लेकिन, कमलनाथ और सिंधिया के बड़े नामों की हवा में इन कार्यकारी अध्यक्षों की भूमिका पर बहुत चर्चा नहीं हो रही है।

वहीं, जो नेता 9 बार लोकसभा का सदस्य रहा हो, जो न विधानसभा सदस्य है और न विधानसभा का चुनाव लड़ रहा है, उसे प्रदेश अध्यक्ष बनाते हैं तो स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा होती है कि क्या वह मुख्यमंत्री का भी दावेदार होगा? कांग्रेस ने पंजाब में अमरिंदर सिंह का नाम चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया, लेकिन उसी परंपरा का पालन मध्य प्रदेश में नहीं हो रहा है। कमलनाथ का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं पेश किया गया। बल्कि इसके बजाय कहा गया कि कमलनाथ और सिंधिया एक साथ काम करेंगे और उसके बाद जो चुनावी परिणाम आएगा, उसे देखते हुए विधायक दल का नेता चुना जाएगा। यहां यह भी कहना होगा कि कांग्रेस के विमर्श और आपसी चर्चा में थोड़ा-सी गलती हुई है क्योंकि उन्होंने फैसला लेने में इतना सोच-विचार किया जिससे मीडिया में भी कई भ्रांतियां फैलीं। प्रदेशाध्यक्ष का बदलाव या इस पद पर किसकी नियुक्ति होती है और मुख्यमंत्री के चेहरे का चुनाव, दो अलग-अलग चीज हैं। लेकिन, फैसले में देरी ने कई प्रकार की हवाओं को जन्म दिया। पर लब्बोलुआब यह है कि वास्तव में यह फैसला लेकर कांग्रेस आलाकमान द्वारा प्रदेश में पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी को साधने की एक नाकाम कोशिश की गई है। नाकाम कोशिश इसलिए क्योंकि इस फैसले ने पार्टी के अंदर एक विचार को जन्म दिया है कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के खेमे ने सिंधिया गुट के ऊपर एक बड़ी जीत हासिल की है। चुनावों से छह महीने पहले इसे एक राजनीतिक दल के लिहाज से शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। यहां कांग्रेस को परास्त तो शिवराज सिंह चौहान को करना था, लेकिन परास्त ज्योतिरादित्य सिंधिया हो गए।

2013 में भी सिंधिया ने ही प्रचार की कमान संभाली थी। प्रचार संभालने का काम असल में पर्याप्त नहीं होता है। होना ये चाहिए था कि पंजाब मॉडल की तर्ज पर कांग्रेस को मुख्यमंत्री के रूप में चेहरा पेश करना था, वो स्थिति ही पार्टी के लिए ज्यादा बेहतर और प्रभावी होती। वहीं, कहा जाता है कि किसी नेता की प्रदेशाध्यक्ष के पद पर नियुक्ति उसे मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर करने की पहली कड़ी होती है, लेकिन, मध्य प्रदेश की राजनीति और प्रदेश के नवनियुक्त अध्यक्ष कमलनाथ के मामले में ऐसा नहीं है। मध्य प्रदेश में उल्टे हालात हैं कि जो नेता नौ बार लोकसभा का सदस्य रह चुका है, जो पार्टी में इस समय सबसे ज्यादा वरिष्ठ नेताओं में शुमार है, देश का वरिष्ठतम सांसद है, कैंद्रीय मंत्री भी रहा है, कांग्रेस से अस्सी के दशक से जुड़ा हुआ है, इंदिरा गांधी और संजय गांधी के जमाने से पार्टी का हिस्सा है, तमाम कांग्रेस अध्यक्षों के साथ उसने काम किया है, ऐसे आदमी को प्रदेशाध्यक्ष बनाकर लाया गया है। सामान्यत: इस कद के नेता का प्रदेश की राजनीति में आने का मतलब ही ये है कि अगर कांग्रेस आगामी चुनावों में जीतती है तो प्रदेश में उनकी एक बड़ी भूमिका होगी। लेकिन, यह भी उतना ही सच है कि कांग्रेस अभी भी कमलनाथ पर दांव नहीं लगा रही है और अगर-मगर की बात हो रही है। अभी कहा जा रहा है कि जब चुनाव होगा और परिणाम आएगा, उसके बाद ही तय होगा कि कौन पांच साल के लिए प्रदेश में कांग्रेस का चेहरा होगा।पार्टी की ओर से साफ संकेत हैं कि अभी सब अपना-अपना जोर लगाएं। जीतने पर कांग्रेस आलाकमान विधायक दल के नेता के नाम पर फैसला करेंगे। यह एक अधूरी नाकाम कोशिश की तरह है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सुरक्षित दांव खेला है। जोखिम उठाकर जिस तरीके का चुनावी दांव खेलना चाहिए था, उन्होंने वह नहीं खेला है। जहां तक पार्टी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव की बात है तो वे भी प्रदेश की राजनीति में बड़ा कद रखते हैं और पार्टी की अंदरूनी खेमेबाजी का हिस्सा भी हैं। उनके महत्व और क्या उनका कद प्रदेश की राजनीति में कम करने से कांग्रेस को नुकसान होगा तो इसके लिए हमें प्रदेश की राजनीति का जातीय गणित समझना होगा। जातीय गणित पर बात करें तो मध्य प्रदेश में पिछड़ी जाति के मतदाताओं की संख्या चालीस से पैंतालीस फीसदी के करीब है। अरुण यादव पिछड़े वर्ग से ही आते हैं, लेकिन, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की तुलना करें तो कांग्रेस की नीति पर सवाल उठते हैं। कुछ समय पहले की बात है, इंदौर में एक जगह दीवार के ऊपर लिखा हुआ था, ‘भाजपा के सदस्य बनिए’, उसे लोग दो तरीके से पढ़ते थे। पहला कि भाजपा की सदस्यता लेकर पार्टी का हिस्सा बनें और दूसरा जो कि कटु सत्य है कि बनिया जाति के लोग भाजपा के ही सदस्य होते हैं। अब यहां देखिए कि जो बनिया हैं उनकी प्रदेश में बहुत कम संख्या है बावजूद इसके भाजपा ने उन्हें इस तरह साध रखा है कि वे उसकी ही तरफ खड़े देखे जाते हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस 40-45 फीसदी पिछड़ा वर्ग का भी महत्व नहीं समझ रहा है। इस पृष्ठभूमि में देखें तो कांग्रेस को जातीय आधार पर इस फैसले से बहुत ज्यादा लाभ नहीं होगा।

वहीं, ऐसा कहना कि एक ओर कांग्रेस युवा नेतृत्व को आगे लाने की बात करती है और दूसरी ओर 71 साल के कमलनाथ पर दांव लगाकर अपना वैचारिक विरोधाभास प्रकट करती है, लेकिन यथार्थ कुछ अलग है। इसलिए आयु और राजनीतिक कौशल का कोई तालमेल नहीं होता। यह केवल एक फैशनेबल बयान होता है कि हम युवाओं को आगे लाएंगे। ऐसा बस कानों को सुनने में अच्छा लगता है। वरना, युवा तो अरुण यादव भी थे, वे कामयाब नहीं हो पाए और सचिन पायलट भी युवा ही हैं, पर राजस्थान में कामयाब हैं, हालाकि इस मामले में भी दो पक्ष हैं, अरूण यादव का मानना है कि जब भी कांग्रेस उनके नेतत्व में सफलता हांसिल करती थी, तो उसका श्रेय दूसरे नेताओं को दिया जाता था, जबकि नाकामियों को उनके उपर डाल दिया जाता था। जबकि सचिन पायलट राजस्थान में हर सफलता का क्रेडिट दिया जाता है।
कुल मिलाकर राहुल गांधी ने ज्यादा जोखिम न दिखाते हुए जोखिम को कम रखने वाला फैसला लिया है। अगर वे जोखिम उठाते तो सिंधिया का चुनाव करते, लेकिन सिंधिया का चयन न करके उस नाम का चयन किया जिस पर साठ फीसदी कांग्रेसजन एकमत हैं। यह भी कह सकते हैं कि सिंधिया को अलग-थलग करने और अपनी राह से हटाने के लिए वे एकमत हो गए। यहां राहुल को यह नहीं देखना चाहिए था कि चुनाव के समय पार्टी की क्या भावनाएं हैं। उन्हें जनता की भावनाओं पर फैसला लेना चाहिए था। पार्टी की भावनाएं गौण होती हैं। जनता की क्या भावनाएं हैं, वह महत्व रखती हैं। मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा, शिवराज बनाम कमलनाथ या शिवराज बनाम सिंधिया, जनता के लिए यह महत्व रखता, पार्टी के अंदर के नेता क्या चाहते हैं, वह महत्व नहीं रखता। पर कांग्रेस की समस्या है कि उसने अपने आंकलन में ये मान लिया है कि जनता में शिवराज को लेकर इतना रोष है कि वह शिवराज के खिलाफ वोट देगी, जिससे कांग्रेस आसानी से जीत जाएगी।

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