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लखनऊ। आजादी के बाद हिन्दी पट्टी के इस सबसे बड़े सूबे में राजनीतिक दौर कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए उतना मुफीद नहीं था। सीपीआई पहले आम चुनाव में अपना खाता भी नहीं खोल पायी, पार्टी को एक प्रतिशत वोट भी नहीं मिले थे, लेकिन 1957 में हुए दूसरे आम चुनाम में भाकपा नेता सरयू पाण्डेय ने बलिया जिले की रसड़ा लोकसभा सीट जीत ली। साथ ही पार्टी ने राज्य विधानसभा की नौ सीटें भी जीत ली थी। 1962 के आम चुनाव में सीपीआई ने सरयू पाण्डेय की रसड़ा सीट के साथ-साथ आजमगढ़ जिले की घासी लोकसभा सीट भी जीत ली और विधानसभा में भी पार्टी के सदस्यों की संख्या 14 तक पहुंच गई।उत्तर प्रदेश में कम्युनिस्ट पार्टियों की सियासी जमीन आज भले ही बंजर हो, कभी राज्य में वाम जनाधार की लहलहाती हुई फसल हुआ करती थी। एक दौर ऐसा भी था जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य में 16 विधायक और पांच सांसद हुआ करते थे, परंतु गठजोड़ की राजनीति, नेताओं के अलगाव और दलित-पिछड़ी राजनीति के उभार ने पार्टी को प्रदेश में अप्रासंगिकता की स्थिति में ला दिया। यूपी में अन्य वामपंथी दलों की स्थिति भी इससे जुदा नहीं है। लेकिन सभी वामदलों की स्थिति यह है कि वह एनजीओ के लिए मानव संसाधन तैयार करने की पाठशाला बन गए हैं।

आजादी के बाद हिन्दी पट्टी के इस सबसे बड़े सूबे में राजनीतिक दौर कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए उतना मुफीद नहीं था। सीपीआई पहले आम चुनाव में अपना खाता भी नहीं खोल पायी, पार्टी को एक प्रतिशत वोट भी नहीं मिले थे, लेकिन 1957 में हुए दूसरे आम चुनाम में भाकपा नेता सरयू पाण्डेय ने बलिया जिले की रसड़ा लोकसभा सीट जीत ली। साथ ही पार्टी ने राज्य विधानसभा की नौ सीटें भी जीत ली थी। 1962 के आम चुनाव में सीपीआई ने सरयू पाण्डेय की रसड़ा सीट के साथ-साथ आजमगढ़ जिले की घासी लोकसभा सीट भी जीत ली और विधानसभा में भी पार्टी के सदस्यों की संख्या 14 तक पहुंच गई।

1964 में भाकपा के राष्ट्रीय स्तर पर हुए विभाजन के बाद उत्तर प्रदेश में भी माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अस्तित्व में आयी, लेकिन विभाजन से कम्युनिस्ट पार्टियों के जनाधार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, वह प्रदेश की शोषित पीडि़त जनता की आवाज बन चुकी थी। इसकी गवाही 1967 में हुए आम चुनावों के परिणाम देते हैं। 67 के लोकसभा चुनावों में सीपीआई को पांच और सीपीएम को एक सीट पर जीत मिली थी। सीपीआई के इश्तियाक सम्भली अमरोहा से, जे. बहादुर घोसी से, सरयू पाण्डेय गाजीपुर से, जगेश्वर बांदा से और एलए खान मुजफ्फरनगर से विजयी हुए थे, जबकि वाराणसी की सीट माकपा के एसएन सिंह ने जीती थी। राज्य विधानसभा में भी सीपीआई के 13 विधायक जीते थे, जिन्होंने चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी। यह अनुभव सीपीआई के लिए बहुत अच्छा नहीं रहा था, 1969 में हुए विधानसभा के उपचुनावों में सीपीआई विधायकों की संख्या चार अंकों में सिमट गई। माकपा के राज्य सचिव रहे एसपी कश्यप सीपीआई नेतृत्व के उक्त फैसले सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘यह बड़ा आश्चर्य जनक था कि सरकार में एक तरफ जनसंघ के रामप्रकाश गुप्ता तो दूसरी तरफ हमारे सीपीआई के साथी बैठते थे।’

बहरहाल 1971 में हुए लोकसभा चुनावों में पार्टी को उतना घाटा नहीं उठाना पड़ा बांदा को छोडक़र बाकी सभी सीटें पार्टी ने बरकार रखी, अलबत्ता कुछ चेहरे जरूर बदल गये, घोसी से जे. बहादुर के स्थान पर झारखंडे राय और मुजफ्फरनगर से एलए खान के स्थान पर विजयपाल सिंह विजयी हुए। 1974 में हुआ विधानसभा चुनाव सीपीआई की सफलता का चरम दौर था, पार्टी के 16 विधानसभा में चुनकर पहुंचे। इस दौर में यूपी के सरयू पांडेय, डॉ. जेड. ए अहमद और झारखंडे राय की गिनती देश के शीर्ष नेताओं में होती थी।

पूर्वांचल मे गाजीपुर, आजमगढ़, बलिया, वाराणसी, फैजाबाद, बुन्देलखंड में बांदा और पश्चिम में मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, मेरठ व बिजनौर जिलों में लाल झंडे का जबरदस्त प्रभाव हुआ करता था, जो समय के साथ कमजोर होने लगा था। आपातकाल के दौर में सीपीआई की कांग्रेस के सहयोगी दल भूमिका के चलते पार्टी का 1977 के लोकसभा चुनावों में सफाया हो गया और विधानसभा में भी पार्टी के विधायकों की संख्या नौ रह गई। जहां तक माकपा का सवाल है तो राज्य में कभी बहुत व्यापक जनाधार नहीं बन पाया, इक्का-दुक्का विधायक जरूर जीतते रहे। 1979 में देश के दूसरे प्रदेशों की तरह यहां भी वाम गठजोड़ बन गया और यह गठजोड़ विधानसभा की सात आठ सीटें भी जीतता रहा। 1980 में झारखंडे राय घोसी से दोबारा लोकसभा के लिए चुने गये। इस दौर के दूसरे कम्युनिस्ट नेताओं का क्षेत्रीय स्तर पर व्यापक प्रभाव हुआ करता था। फैजाबाद में सीपीआई के मित्रसेन यादव, सीपीएम के अकबर हुसैन बाबर, बांदा में सीपीआई के राम सजीवन सिंह और सुरेंद्र पाल वर्मा, वाराणसी में सीपीआई के उदल व सीपीएम के राज किशोर, बाराबंकी में सीपीआई के रामचन्द्र बक्श सिंह, मउ में सीपीआई के इम्तियाज अहमद, बिजनौर में सीपीएम के रामस्वरूप सिंह ऐसे नेता थे जिनकी हनक से स्थानीय प्रशासन हिल जाया करता था। इसके अलावा यूपी के ही अतुल कुमार अंजान की पहचान देश के तेज तर्रार युवा वामपंथी नेता के तौर पर होने लगी थी।

1987 आते-आते राज्य में एक बार पुन: गैर कांग्रेसी राजनीति का ताना-बाना बुना जाने लगा। मुलायम के नेतृत्व में बने क्रंाति मोर्च में भाकपा व माकपा भी शामिल हो गई। वरिष्ठ भाकपा नेता अशोक मिश्र बताते है, ‘इस मोर्चे ने मुलायम को राज्य का शीर्ष नेता बना दिया, जब लखनऊ के ला-मार्ट ग्राउंड में मोर्चे की सभा हुई तो उसमें लाल झंडे की जबरदस्त भागीदारी थी, लेकिन बदले में हमें धोखा ही मिला।’ 1989 का लोकसभा चुनाव वाममोर्चे ने जनता दल के साथ मिलकर लड़ा, जिसमें भाकपा को दो और माकपा को एक सीट हासिल हुई। फैजाबाद से भाकपा के मित्रसेन यादव व बांदा से इसी पार्टी के राम सजीवन सिंह विजयी हुए, जबकि कानपुर से माकपा की सुभाषिनी अली विजयी हुई। विधानसभा में इन पार्टियों की स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। राज्य में मुलायम के नेतृत्व में जनता दल ने बहुमत की सरकार बनाई।

1990 में केंद्र की विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया तो वामदल उनके साथ मुस्तैदी से खड़े थे। मंडल आंदोलन ने पिछड़ों की राजनीति का नया उभार पैदा किया, जिसने सबसे ज्यादा नुकसान कम्युनिस्टों की वर्ग संघर्ष की राजनीति को पहुंचाया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य अतुल कुमार अंजान कहते हैं, ‘मंडल ने यह तय कर दिया कि झारखंडे राय और सरयू पाण्डेय ने दलितों और पिछड़ों के लिए चाहे जितना संघर्ष किया हो, लेकिन वे उनके जनप्रतिनिधि नहीं बन सकते हैं।’ इस बीच मंदिर आंदोलन के चलते वीपी सिंह सरकार का पतन और जनता दल का विभाजन हो गया, दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां जनता दल के साथ पूर्ववत बनी रही।

1991 के चुनावों में मंदिर-मस्जिद आंदोलन के चलते यूपी की कम्युनिस्ट पार्टियों की ताकत घट गई। दोनों ही पार्टियां अपनी वर्तमान लोकसभा सीटें गवां बैठी। सीपीआई के लिए कुछ राहत की बात यह रही कि उसके प्रत्याशी विश्वनाथ शास्त्री ने पुरानी गाजीपुर लोकसभा सीट एक बार फिर से जीत ली। विधानसभा में भी उसके चार सदस्य जीतकर पहुंचे। राज्य विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत प्राप्त हुआ, जिसकी सरकार 1992 में बाबरी विध्वंश के बाद चली गई।
इस बीच एक नये घटनाक्रम के तहत 1992 में ही समाजवादी पार्टी का गठन मुलायम के नेतृत्व में हुआ, जिसने दलित आधार वाली बहुजन समाज पार्टी के साथ राजनैतिक गठजोड़ कर लिया। इस बीच राज्य में दलित-पिछड़ों की गोलबंदी की आहट साफ सुनाई पडऩे लगी थी, जिसने कम्युनिस्ट पार्टियों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया, जिनका आधार ही किसान के रूप में पिछड़े और मजदूर के रूप में दलित थे। फिर भी मुलायम से वामपंथियों की दोस्ती बनी रही। इसका अंदाजा एक घटनाक्रम से लगाया जा सकता है। उस समय भाकपा के राज्य सचिव रहे मित्रसेन यादव के पुत्र आनंदसेन यादव जो भाकपा के युवा नेता भी थे, वे सुल्तानपुर जिले की इसौली सीट से सपा का टिकट मांगने के लिए 1993 में मुलायम के पास फैजाबाद जिले के सपा नेता स्व. परशुराम यादव के साथ गये थे। इसी सीट से वाममोर्चे की दूसरी पार्टी माकपा के राज्य सचिव राम सुमेर यादव भी उम्मीदवार थे।

बकौल परशुराम मुलायम ने आनंदसेन से पूछा, ‘अपने पिता से पूंछ कर आये हो’ आनंदसेन ने नहीं में उत्तर दिया। मुलायम ने उनसे कहा, ‘आपके पिता कह देंगे तो मैं तुम्हें टिकट दे दूंगा।’ मित्रसेन को पूरे घटनाक्रम की जानकारी हुई तो उन्होंने आनंदसेन को सीपीआई के ही टिकट पर चुनाव लड़ाने का वायदा किया। 1993 के विधानसभा चुनाव में इसौली सीट पर सीपीआई के आनंदसेन व सीपीएम के राम सुमेर एक-दूसरे के आमने-सामने थे। परिणाम आये तो राम सुमेर को 18 हजार व आनंदसेन को 17 हजार वोट प्राप्त हुये। आनंदसेन के विधायक बनने का सपना भले ही इस चुनाव में अधूरा रह गया हो, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने मुलायम-मित्रसेन की दोस्ती की बुनियाद जरूर तैयार कर दी। इस विधान चुनाव ने वामदलों के दिग्गज नेताओं को जबरदस्त झटका दिया। सीपीआई को जो तीन सीटें मिली उसमें तीन बार विधायक व एक बार सांसद रहे मित्रसेन यादव मिल्कीपुर से 900 वोटों से और नौवीं बार विधानसभा की दहलीज पर पहुंचे। बुजुर्ग नेता ऊदल अपनी परम्परागत कोलसला सीट पर सौ से कम वोटों से जीत पाये, जबकि अफजल अंसारी की जीत अपेक्षाकृत अधिक मतों से हुई थी।

राज्य विधानसभा त्रिशंकु रही, सीपीआई ने मुलायम के नेतृत्व वाले सपा-बसपा गठबंधन को समर्थन किया, जिसकी राज्य में सरकार बनी। इस बीच मुलायम-मित्रसेन के बीच बने मधुर रिश्ते ने एक ऐसा घटनाक्रम तैयार किया, जिससे राज्य में भाकपा का वजूद ही खतरे में पड़ गया। 1994 में भाकपा के राज्य सचिव रहे मित्रसेन यादव, विधायक अफजल अंसारी और राज्यसभा के सदस्य रहे वरिष्ठ नेता डॉ. जेडए अहमद अपने अन्य साथियों के साथ सपा में शामिल हो गये। इस घटना से भाकपा नेताओं के मुलायम के साथ रिश्ते भी बिगड़ गये। उस समय वरिष्ठ विधायक ऊदल ने अपनी नाराजगी जताते हुए कहा था, ‘लंगड़ बिलार घर में ही सियार’। इसके बाद तो भाकपा के बिखराव का सिलसिला ही शुरू हो गया। एक अन्य वरिष्ठ नेता राम सजीवन सिंह भी थोड़े समय के बाद बसपा में शामिल हो गये।
भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश उस दौर का जिक्र करते हुए बताते हैं, ‘ये नेता दलित व पिछड़ा जनाधार खिसकने से बहुत बेच्ैान थे। उन्हें अपना संसदीय राजनीतिक भविष्य खतरे में नजर आ रहा था। इन लोगों ने इस तरह से प्रचारित किया कि पार्टी की पूरी राज्य इकाई का सपा में विलय हो रहा हैं और इसी प्रचार के कारण जेडए अहमद भी सपा में शामिल हो गये, लेकिन जल्दी ही उन्हें सच्चाई का एहसास हो गया और वे फिर से पार्टी में वापस गये।’

वरिष्ठ भाकपा नेता अशोक मिश्र कहते हैं, ‘मित्रसेन सिंचाई मंत्री बनने के लिए सपा में शामिल हुए थे तो राम सजीवन के पार्टी छोडऩे के पीछे उनके व्यक्गित कारण भी थे।’ 1996 का लोकसभा चुनाव दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों ने सपा और जनता दल से मिलकर लड़ा था लोकसभा चुनावों में तो उनके हाथ कुछ नहीं आया, लेकिन विधानसभा चुनावों में सीपीएम सपा से अच्छे रिश्ते के चलते चार सीटें जीतने में कामयाब रही, जबकि अब तक के चुनावों में वामदलों में अगुआ रही सीपीआई मात्र एक सीट ही जीत पायी। सीपीएम का प्रदेश के राजनैतिक इतिहास में यह सबसे बेहतर प्रदर्शन था। 2002 के विधानसभा चुनावों में भी सीपीएम ने राज्य में दो सीटें जीती थी, परंतु इसके बाद हुए किसी भी चुनाव में दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों का खाता नहीं खुला है। 2003 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में बनी सपा सरकार के भ्रष्टाचार व भूमि अधिग्रहण नीति के खिलाफ भाकपा ने कुछ छोटे दलों के साथ मिलकर मोर्चा खोला था, परंतु यह कवायद भी पार्टी को खोया हुआ जनाधार वापस नहीं दिला पायी।

सीपीआई के राज्य सचिव डॉ. गिरीश कहते हैं, ‘आजादी के आंदोलन की उपलब्धियां समय के साथ कम होती गयी जिसके चलते साम्प्रदायिक और जाति की राजनीति का उभार हुआ। इसके अतिरिक्त वैश्विक स्तर पर समाजवादी दुनिया की अनुपस्थिति का प्रभाव भी वाम आंदोलन पर पड़ा। आज किम्युनल, कैश, कास्ट और क्रिमिनल चुनाव जिताने के प्रमुख कारक हैं और हमारा उनसे नाता नहीं है, मुझे उम्मीद है कि एक दिन यूपी में तस्वीर बदलेगी।’ जबकि सीपीएम के नेताओं का मानना है, ‘अंदरूनी संघर्षों और पहचान की राजनीति के चलते कम्युनिस्ट पार्टियां राज्य की राजनीति में हंासिये पर चली गई, भूमि सुधार के कारण पिछड़ी जातियों के पास जमीनें आयी और हरित क्रांति के चलते आयी समृद्धि ने पिछड़ों में जाति आधारित राजनीति का विकास किया। चौ. चरण सिंह का अजगर फार्मूला इसका एक उदाहरण है, जिसका मतलब था अहीर, जाट, गूजर और राजपूतों का गठजोड़। इसी तरह दलितों में भी आरक्षण के चलते एक बुर्जुआ वर्ग पैदा हुआ जिसके कारण वामसेफ , डीएसफोर जैसे संगठन और बसपा जैसी पार्टियां अस्तित्व में आये, जिन्होंने कम्युनिस्ट आंदोलन को गहरा आघात पहुंचाया। इस राजनीति के स्थान पर वर्गीय राजनीति तेज करेंगे, क्योंकि पूंजीवाद भुखमरी और बेरोजगारी के अलावा कुछ नहीं देगा? अन्तिम विकल्प समाजवाद ही है।’

एसयूसीआई के रबालेन्दु कटियार कहते हैं, ‘इन पार्टियों का गठन ही कम्युनिस्ट प्रक्रिया के तहत नहीं हुआ था, जिस कारण इनका बुर्जुआ चरित्र बरकार रह गया। यही वजह है कि शुरूआती सफलता के बवजूद इनका निरंतर पतन हो रहा है।’ इन दलों के नेताओं के कुछ तर्कों को नकार भी दें तो यह एक सच्चाई है कि ये पार्टियां जिस किसान मजदूर गठजोड़ के बल पर दिल्ली के लालकिले की प्रचीर पर लाल झंडा फहराने का सपना देख रही थी, वह ७० के दशक से कमजोर पडऩा शुरू हुआ और ९० का दशक आते-आते बिखर गया। मंडल की राजनीति ने इनके किसान जनाधार को, तो बहुजन मूवमेंट ने इनके दलित जनाधार को निगल लिया। जनाधार खिसकने के चलते ही पुराने कद्दावर नेताओं ने भी अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बरकरार रखने के लिए दलित और पिछड़ा आधार रखने वाली पार्टियों में शरण ले ली। आज ये कम्युनिस्ट पार्टियां एनजीओ के लिए युवाओं की फौज तैयार करने वाली संस्था भर बनकर रह गई हैं और लगता है कि अपनी इसी भूमिका से संतुष्ट भी होती जा रही हैं।

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