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मौत का जहर है फिजाओं में, अब कहां जा के सांस ली जायें। ये एक चर्चित शेर की लाइनें ही नहीं हैं, बल्कि अब देश के शहरी जीवन की हकीकत बन गई है। दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में देश के 15 शहर और उत्तर प्रदेश के छह शहर शामिल होने से ये पंक्तियां सच साबित हो गई हैं। पर्यावरणविदों की चिन्ताएं बढ़ गयी हैं तो सरकार प्रदूषित शहरों में स्वच्छ हवा के लिए हर संभव उपाय करने का वायदा कर रही है।

असल में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की हाल की एक रिपोर्ट में दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में उत्तर प्रदेश के छह शहरों का नाम गिनाया गया है। कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, लखनऊ, आगरा और फिरोजाबाद को दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल किया गया है। इस सूची में कानपुर दूसरे और लखनऊ 13वें स्थान पर है। राज्य सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा कि डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट का अध्ययन किया जाएगा। 2016 की रिपोर्ट के आधार पर कानपुर सबसे प्रदूषित शहर बताया गया है। उन्होंने कहा कि यह विश्लेषण किया जाएगा कि किस आधार पर उत्तर प्रदेश के छह शहर सूची में शामिल किए गए। साथ ही उन्होंने दावा किया कि इन प्रदूषित शहरों में हवा को स्वच्छ रखने के हरसंभव उपाय किए जाएंगे।
वास्तव में ‘प्रदूषण के लिए सिर्फ सरकार या सरकार का एक विभाग जिम्मेदार नहीं होता। इसमें कई विभागों की सामूहिक जिम्मेदारी होती है और जनता की भी जिम्मेदारी है कि जिस हवा में वह सांस ले रही है, उसे स्वच्छ रखने के लिए क्या कुछ किया जाए। उन्होंने कहा कि 2013 में विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में चीन के शहर सबसे ऊपर थे, लेकिन पिछले सालों में चीन ने कार्ययोजना बनाई और समय सीमा तय करके वायु गुणवत्ता में बहुत हद तक सुधार कर लिया है। इसी तरह की कार्ययोजना यहां भी बनाने की जरूरत है।
किशोर ने कहा कि प्रदूषण की प्रमुख वजहें कूड़ा जलाना, डीजल-पेट्रोल आधारित परिवहन, कोयला आधारित उद्योग तथा बिजली घर, निर्माण सामग्री को बिना ढके भवन निर्माण, जाम की समस्या, शहर की ओर लोगों का पलायन आदि हैं। उन्होंने सुधारात्मक उपाय सुझाते हुए कहा कि कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण, स्वच्छ ऊर्जा का अधिकतम उपयोग, जीवाश्म ईंधन आधारित उद्योग धंधों को समयबद्ध तरीके से बंद करना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना, जाम की समस्या से मुक्ति की योजना, निर्माण सामग्री को ढक कर भवन निर्माण कर प्रदूषण से काफी हद तक मुक्ति पाई जा सकती है।
ग्रीनपीस के सीनियर कैंपेनर सुनील दहिया ने बताया कि देश में वायु प्रदूषण की स्थिति बहुत खराब है। अगर सिर्फ 2016 के बाद आंकड़ों को देखा जाए तो कानपुर को इस सूची में दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बताया गया है। 20 सबसे प्रदूषित शहरों में अकेले भारत के 15 शहर शामिल हैं। इन 15 शहरों में भी सबसे ज्यादा उत्तर भारत खासकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बिहार के शहर हैं। इससे पता चलता है कि अभी भारत को वायु प्रदूषण संकट से निपटने के लिए बहुत कुछ करना बाकी है।
उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2016 के लिए सिर्फ 32 भारतीय शहरों का आंकड़ा लिया है जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मिलकर आज के समय में उत्तर प्रदेश के 24 शहरों में वायु निगरानी का डाटा एकत्रित करते हैं। अभी भी 51 जिलों में वायु गुणवत्ता को नापने के लिये कोई यंत्र नहीं लगाया जा सका है। ऐसे में अगर बाकी जिलों से भी वायु गुणवत्ता के डाटा को डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में शामिल किया जाता तो उत्तर प्रदेश में प्रदूषित शहरों की संख्या और तस्वीर कहीं ज्यादा भयावह होगी। क्लाइमेट एजेंडा की मुख्य अभियानकर्ता एकता शेखर का कहना है कि दुनिया भर में होने वाली 70 लाख मौतों में ज्यादातर मौतें देश के चुनिंदा शहरों में हो रही हैं। ऐसे में अब आपातकाल की स्थिति बन चुकी है। लंबे समय से देश में वायु गुणवत्ता निगरानी तंत्र को पारदर्शी बनाने राष्ट्रीय स्तर पर इस तंत्र का विस्तार किए जाने की मांग की जा रही है।
गंदगी नदी बनी गोमा
राजधानी लखनऊ में गोमती नदी अब गंदगी नदी के रूप में बदल गई हैं। खूब हरी-भरी दिख रही है, लेकिन कई जगह जलधारा सूख गयी है। मछलियां व अन्य जीव-जंतु मर रहे है जिससे लोगों को कई तरह की बीमारियों का शिकार होना पड़ रहा है। जिसको पर्यावरण वैज्ञानिक चिंतित हैं। वे कह रहे हैं आज से दो साल पहले लखनऊ में जिस हालत में गोमती थी उससे भी बदतर स्थिति अब हो गयी है। जलकुंभी साफ न की गयी तो आने वाले सालों में गोमती नदी नाले के रूप में तब्दील हो जाएगी। कारण यह है कि जलकुंभी की वजह से सूर्य की किरणें बाकी बचे पानी तक नहीं पहुंच पा रहीं। पानी में घुली ऑक्सीजन भी कम हो गयी है। इससे न केवल मछलियां मर रही हैं बल्कि अन्य जलीय जंतुओं का अस्तित्व मिट रहा है। जब अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार लखनऊ से सांसद बने थे तब से गोमती को साफ किया जा रहा है। कई बार मंत्री रह चुके लालजी टंडन की तो जैसे जान ही गोमती में बसती है। वे अपने मंत्रित्व काल में गोमती नदी के उद्धार को लेकर बहुत चिंतित रहे। लेकिन गोमती एक्शन प्लान से आगे कुछ नहीं कर पाए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च हुए। गोमती से तलछट, रेत और गाद निकाली गई। गुलाला घाट,1090 चौराहा आदि के पास गोमती का सुंदरीकरण करके उसके पाट को जरूर कम कर दिया गया। लालजी टंडन, मायावती के बाद अखिलेश यादव ने भी गोमती को लेकर चिंता दिखाई। अखिलेश सरकार में 1500 करोड़ की गोमती रिवर फ्रंट परियोजना शुरू हुई। नदी की खुदाई हुई। मिट्टी निकाली गयी। कुछ पक्के निर्माण हुए। कुछ पूरे हुए। कुछ आज भी अधूरे हैं।

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